मां का त्याग: तीन साल की बेटी को छोड़कर कनाडा जाने पर इस मां ने सुने बहुत ताने, अब बताई अपनी मजबूरी

कुछ दिन पहले मानसा बनोथ नाम की यूजर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था इस घटना का शीर्षक मां का त्याग है।  जिसमें वह एयरपोर्ट पर अपनी तीन साल की बेटी को रोते हुए अलविदा कह रही थीं। मानसा कनाडा जा रही थीं और अपनी छोटी बेटी को हैदराबाद में अपने माता-पिता की देखभाल में छोड़ रही थीं

मां का त्याग

तानों से भरा सफर

एक सिंगल मां होने के नाते, उनके पास ज़्यादा विकल्प नहीं थे। अपनी इतनी छोटी बेटी को छोड़ने के चलते उन्हें ट्रोलिंग झेलनी पड़ी। किसी ने कहा कि “कैसी मां है जो इतनी छोटी बच्ची को छोड़ गई”, तो किसी ने उसके मातृत्व पर ही सवाल खड़े कर दिए। सोशल मीडिया पर भी उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर उसने ऐसा कदम क्यों उठाया।

भावनात्मक संघर्ष

छोटी सी शादीशुदा ज़िंदगी में उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। 2020 में शादी होती है, कुछ दिन तक सब ठीक चल रहा होता है फिर पति के ब्याहार में बदलाव आने लगता है। जिससे दोनों में अक्सर झगडे होने लगते है, फिर मार्च 2022 में बेटी के जन्म के बाद उनके पति ने उनसे सारे कॉन्टैक्ट खत्म कर दिए। मनसा ने बताया कि शादी टूटने के बाद वह अपने पति की मदद के बिना अपनी बेटी की देखभाल कर रही थीं। हैदराबाद में रहने वाले उनके माता-पिता ने तब उनका साथ दिया जब वह उनके साथ रहने वापस आईं।

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मजबूरी या महत्वाकांक्षा? मां का त्याग

अपनी बेटी को सपोर्ट करने के लिए, मानसा ने सबसे पहले भारत में नौकरी ढूंढी। बहुत संघर्ष के बाद, उन्हें एक HR प्रोफेशनल के तौर पर ₹40,000 प्रति महीने की सैलरी वाली नौकरी मिली। उन्होंने कहा, ‘मैं नाइट शिफ्ट में काम करती थी। मेरी इन-हैंड सैलरी लगभग ₹35,000 प्रति महीने थी। यह मेरे और मेरी बेटी का खर्च चलाने के लिए मुश्किल से ही काफी थी। इसे ही कहते है माँ का त्याग।

महिला ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि उसका कनाडा जाना कोई शौक या महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि मजबूरी थी। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही थी।

“मैं अपनी बेटी को बेहतर भविष्य देना चाहती थी,” उसने कहा।
“अगर आज कुछ सालों के लिए दूर रहकर मैं उसकी पढ़ाई और सुरक्षित जीवन सुनिश्चित कर सकती हूँ, तो यह त्याग मुझे मंजूर है।”

जॉब के लिया किया अप्लाई

मनसा कई कंपनी में जॉब के अप्लाई किया कोई रिजल्ट सही नहीं मिल पा रहा था । फिर मानसा को कनाडा से नौकरी के लिए ऑफर आता है जो अच्छा खासा अमाऊंट पे कर रही थी । उसने सोचा क्यू ना मै और मेरी बेटी हम दोनों कनाडा सिफ़्त हो जाते है वैसे यहाँ अब बचा ही क्या है । फिर वो वीसा पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया । मानसा ने बताया कि उनकी बेटी को पासपोर्ट बनवाने के लिए उनके पति की सहमति ज़रूरी है। उनका तलाक़ का केस भी चल रहा है।
मनसा ने कहा- “मेरी बेटी तीन साल की है। मेरे पूर्व पति किसी भी बात का जवाब नहीं देते, और मैं यह लड़ाई अकेले लड़ रही हूं। वे मेरी बेटी को पासपोर्ट बनवाने से रोक रहे हैं, इसलिए मैं इस मामले को कानूनी तौर पर आगे बढ़ा रही हूं। मैंने केस फाइल किया है, और मेरे वकील मेरी तरफ से पेश हो रहे हैं। अभी हम अपनी बेटी का पासपोर्ट अलग से बनवाने की कोशिश कर रहे हैं, इसे कस्टडी या तलाक़ की कार्यवाही से नहीं जोड़ रहे हैं, क्योंकि मैं उनके साथ नहीं रह रही थी।”

समाज को क्या सिख लेनी चाहिए?

यह घटना एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है — क्या हम किसी महिला के फैसले को समझने से पहले उसे जज कर देते हैं?

विदेश जाकर काम करने वाले पुरुषों को अक्सर “जिम्मेदार” कहा जाता है, लेकिन जब कोई मां वही कदम उठाती है, तो उसके चरित्र और ममता पर सवाल उठने लगते हैं।

निष्कर्ष

कभी-कभी दूरी, लापरवाही नहीं बल्कि जिम्मेदारी का दूसरा नाम होती है। हमें किसी के फैसले पर टिप्पणी करने से पहले उसकी परिस्थितियों को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

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