अमेरिका की संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें अमेरिका के Neuroscientist Jared Cooney Horvath ने यह बताया कि (Screen Time Impact on Children) पिछले 20 वर्षों में बच्चों की पढ़ने लिखने की क्षमता गणित की समझ ध्यान लगाने की शक्ति यानी कंसंट्रेशन और गहराई से सोचने की क्षमता कमजोर हुई है। और यह रिपोर्ट पेश करने वाले ये जो डॉक्टर हैं ये खुद एक न्यूरोसाइंटिस्ट हैं और यह एक शिक्षक भी हैं। डॉक्टर हॉरवथ का कहना है कि हर बच्चे के हाथ में लैपटॉप है। हर टेस्ट आजकल हर परीक्षा ऑनलाइन हो रही है। हर बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन है। जिसके अंदर Ai भी है जिसके अंदर Search Engen भी है, Google भी है, सब कुछ है और यहां तक कि बच्चे होमवर्क भी अब अपने स्क्रीन पर ही कर रहे हैं और उसमें भी एआई की मदद ले रहे हैं। और इसी वजह से बच्चों के सोचने और समझने की क्षमता लगातार कम होती जा रही है।

द प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट में डरावना खुलासा
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 50% से ज्यादा बच्चे स्कूल में रोज 1 से 4 घंटे तक स्क्रीन देखते हैं। लगभग 25% बच्चे 7 घंटे के स्कूल टाइम में 4 घंटे से ज्यादा समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं। लेकिन डराने वाली बात यह है कि जब बच्चे क्लास में किसी भी तरह के डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे होते हैं, तब हर एक घंटे में करीब 38 मिनट उनका ध्यान पढ़ाई से भटकता है। यानी छात्र क्लास में तो रहता है शरीर से लेकिन मन में मन उसका कहीं और है।
एक्सपर्ट के अनुसार स्क्रीन का बच्चो पर असर (Screen Time Impact on Children)
पीसा यानी द प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट ने भी दुनिया भर के बच्चों को लेकर एक रिसर्च किया। इसमें दुनिया भर के 15 वर्ष की उम्र के बच्चों की रीडिंग, मैथ्स और साइंस में दक्षता की जांच की गई। और इसके मुताबिक क्लास में जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज्यादा था उन्हें कम नंबर मिले। रीडिंग, मैथमेटिक्स और साइंस में उनका परफॉर्मेंस बेहद कमजोर पाया गया। और इसी तरह के कुछ और अंतरराष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय टेस्ट भी यही बताते हैं कि जिन छात्रों का क्लास में स्क्रीन टाइम ज्यादा है उनका प्रदर्शन उतना ही कमजोर है Screen Time Impact on Children । डॉक्टर हॉरवथ की स्टडी से पता चलता है कि कागज पर पढ़ने लिखने वाले बच्चे स्क्रीन पर पढ़ने वाले बच्चों से ज्यादा समझदार होते हैं और ज्यादा याद रख पाते हैं। स्क्रीन पर पढ़ते समय दिमाग जल्दी थक जाता है। ध्यान-बार भटकता है और गहराई से सोच नहीं बनती और लिखने से भी फर्क पड़ता है। जो बच्चे हाथ से लिखते हैं वो बातों को समझ कर लिखते हैं।
लेकिन जो टाइप करते हैं वो अक्सर सुनी हुई बातों को कॉपी करते हैं। यानी हाथ से लिखना ब्रेन को एक्टिव करता है और टाइप करना दिमाग को आलसी बनाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसका असर सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है। अगर बच्चों की सोचने की शक्ति कमजोर होती रही तो इसका असर उनके भविष्य पर पड़ेगा। उनके काम पर पड़ेगा। नई खोज जब आगे करने का समय आएगा। समाज के लिए फैसले लेने का समय आएगा और उन पर तो फर्क पड़ेगा ही पूरे देश पर फर्क पड़ेगा। इसलिए यह सिर्फ शिक्षा का मुद्दा नहीं है। यह देश के भविष्य का भी सवाल है।
स्क्रीन से बच्चो पर पड़ रहे प्रभाव पे एक्सपर्ट की राय
डॉक्टर हॉरवथ ने अमेरिका की संसद को कुछ सुझाव दिए हैं जो आप भी सुन सकते हैं। पहला कोई भी नई टेक्नोलॉजी तब तक स्कूलों में ना लाई जाए जब तक यह साबित ना हो जाए कि वह सचमुच पढ़ाई को बेहतर बनाती है। दूसरा बच्चों के डाटा की सुरक्षा होनी चाहिए। और तीसरा बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय होनी चाहिए। इस समय की जो पीढ़ी है यह शायद पहली पीढ़ी ऐसी होगी जो अपने माता-पिता से कम स्मार्ट होगी। आपने देखा होगा हमारे देश में या पूरी दुनिया में जो अगली पीढ़ी आती है वह पिछली पीढ़ी से ज्यादा स्मार्ट होती है।
पिछली पीढ़ी ने जो काम किए होते हैं उन्हें और ज्यादा आगे लेकर जाती है। पिछली पीढ़ी के किए गए कामों को और बेहतर बनाती है। लेकिन यह पीढ़ी शायद पहली बार ऐसा हो रहा है जब यह पीढ़ी शायद अपने माता-पिता से भी कम स्मार्ट होगी क्योंकि यह पीढ़ी ना तो हाथ से लिखती है और यह पीढ़ी ना ही शायद अपने दिमाग से सोचती है। हम सबकी बात नहीं कर रहे लेकिन जिस प्रकार के डिजिटल डिवाइस आजकल बच्चों को मिल रहे हैं उसकी वजह से उन्होंने अपने दिमाग से कुछ भी काम लेना बंद कर दिया है।
भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का पुरानी और नई शिक्षा पर मत
आपने भारत के दूसरे राष्ट्रपति और भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में जरूर सुना होगा। वो भारत के महान दार्शनिक, शिक्षक और राजनेता थे और उनके जन्मदिन पर 5 सितंबर को हर साल शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने एक किताब लिखी जिसका नाम है । इंडियन फिलॉसफी और किताब के वॉल्यूम वन में उन्होंने प्राचीन भारत की गुरुकुल शिक्षा पद्धति के बारे में लिखा था। गुरुकुल में वेदों और शास्त्रों का पाठ किया जाता था। हाथ से लिखकर अभ्यास किया जाता था। बार-बार दोहराया जाता था और ध्यान और याददाश्त पर विशेष जोर दिया जाता था। लेकिन अब बच्चों को हम स्क्रीन तो देते है । लेकिन हमारा और स्कूलों का ध्यान बच्चों के सोचने और समझने की क्षमता को बढ़ाने में नहीं है। तो यह आज हम आपको यह बताना चाहते हैं कि अपने बच्चों को आप टेक्नोलॉजी सिखाइए जरूर लेकिन उन्हें पूरी तरीके से टेक्नोलॉजी पर आश्रित मत छोड़िए ।
बचाव
जितना हो सके बच्चों को मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल डिवाइस से दूर ही रखें। आज के समय में तकनीक पूरी तरह से जीवन का हिस्सा बन चुकी है, इसलिए बच्चों को पूरी तरह टेक्नोलॉजी से अलग करना संभव नहीं है, लेकिन उसके उपयोग की सीमा तय करना बेहद जरूरी है। छोटे बच्चों को खासकर बिना जरूरत मोबाइल देने से बचें। यदि पढ़ाई के लिए स्क्रीन का उपयोग करना भी पड़े तो समय निर्धारित करें और उसके बाद उन्हें किताबें पढ़ने, हाथ से लिखने, खेलकूद करने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करें।
बच्चों को आउटडोर गेम्स, रचनात्मक गतिविधियों जैसे ड्रॉइंग, पेंटिंग, कहानी लिखना या किताब पढ़ने की आदत डालें। घर में “नो मोबाइल टाइम” तय करें, जैसे खाने के समय या सोने से पहले। माता-पिता खुद भी मोबाइल का सीमित उपयोग करें क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। सही मार्गदर्शन और संतुलित उपयोग से ही हम बच्चों की सोचने, समझने और ध्यान लगाने की क्षमता को मजबूत रख सकते हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य की नींव तैयार कर सकते हैं।
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