America-Iran War दुनिया पर आने वाला है सबसे बड़ा ऊर्जा संकट ? आपको कैसे बचना है

America-Iran War अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप कल रात 10:30 बजे एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हैं। इससे पहले उन्होंने ईरान को गाली गलौज वाली भाषा में धमकाया। धमकाते हुए स्टेट ऑफ हॉरमोस खोलने की चेतावनी दी। लेकिन ओमान के साथ मिलकर ईरान अब हॉररमूस में परमानेंट टोल सिस्टम लागू करने की तैयारी कर रहा है। युद्ध के 37 दिन बाद भी ट्रंप जिस तरह क्लूलेस दिख रहे हैं उससे पूरी दुनिया की चिंता बढ़ गई है। क्योंकि वॉर की वजह से तेल और गैस की सप्लाई चौक हो गई है और इसका असर अब पूरी वर्ल्ड इकॉनमी पर पड़ रहा है। यानी कि ट्रंप की तानाशाही पूरी दुनिया के लिए तबाही बनती जा रही है। उधर मिसाइलें चली इधर तेल के दाम आसमान पर पहुंचे। उधर ड्रोन से अटैक हुआ इधर तेल गैस की सप्लाई चोक हुई। उधर फाइटर जेट्स ने बमबारी की इधर खाने-पीने के सामान में आग लग गई। अमेरिका, इजराइल ने हमला किया और ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस बंद कर दी। तो एशिया से लेकर अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया तक, अमेरिका से लेकर यूरोप तक हाहाकार मच गया।

America-Iran War
America Iran war impact on world

America-Iran War की वजह से पूरी दुनिया में तेल गैस की किल्लत, महंगाई की महामारी और आर्थिक मंदी आने वाला है। दर्जनों देशों में तेल और गैस की किल्लत है। कहीं इमरजेंसी लगानी पड़ी तो कहीं पेट्रोल और डीजल को राशन की तरह बांटा जा रहा है। अमेरिका के प्रेसिडेंट ईरान पर बमबारी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं। तबाही का जश्न मनाते हैं और कहते हैं कि उनकी जो मर्जी होगी वह करेंगे क्योंकि उनके विरोधी उनको किंग कहते हैं। लप एक्सप्लोद वीर मदर यू सी देयर वेपन से दे कॉल मी किंग यू बिलीव इट नो किंग आई एम सच अ किंग आई गेट बोलू प्रीटी अमेजिंग किंग इफ आई वा किंग लॉट बट आई कुड बीइंग अ लॉट मोर आई वा किंग लेकिन ट्रंप की इस मनमर्जी ने दुनिया को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है। खुद अमेरिका के बड़े-बड़े जानकार कह रहे हैं कि ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़कर ना सिर्फ अमेरिका को बल्कि वर्ल्ड इकॉनमी को डिप्रेशन यानी मंदी के मुहाने तक पहुंचा दिया। क्योंकि 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद क्रूड ऑयल 50 से 60% महंगा हो चुका है। लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी 140% महंगी हो चुकी है। लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस यानी एलपीजी के दाम करीब 45% बढ़ चुके हैं। यूरिया जैसे फर्टिलाइजर की कीमत 50% बढ़ गई है। प्लास्टिक बनाने में काम आने वाले पेट्रोकेमिकल जैसे नेफ्था के दाम 20% बढ़ चुके हैं। सल्फर की कीमत 200% तक बढ़ चुकी है और हीलियम के दाम 100% तक बढ़ चुके हैं। ईंधन की महंगाई, फर्टिलाइजर की क्राइसिस, प्लास्टिक और रबर इंडस्ट्री के कच्चे माल की किल्लत दुनिया में महंगाई और बेरोजगारी को बढ़ाने वाली है। भारत से लेकर एशिया के तमाम देशों और अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका और यूरोप ही नहीं खुद अमेरिका में महंगाई बढ़ रही है। प्राइस दिसली $53 अमेरिका में डीजल की औसत कीमत करीब $5.5 पर गैलन पहुंच गई है। यानी पिछले चार हफ्तों में कीमत 45% बढ़ी है। यह चार हफ्तों में डीजल महंगा होने का रिकॉर्ड है। इससे ट्रक और ट्रैक्टर चलाना और ट्रेन का भाड़ा सब कुछ महंगा होगा। इसका सीधा असर डीजल ईंधन से चलने वाली अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसका मतलब होगा कि आगे चलकर ग्राहकों को किराने के सामान महंगे मिलेंगे और अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी क्योंकि डीजल ही वह ईंधन है जो अमेरिका और वर्ल्ड इकॉनमी को चलाता है। धीरे-धीरे इन बातों का असर अर्थव्यवस्था के दूसरे पहलुओं पर पड़ेगा। तेल के दाम पर खर्च बढ़ेगा तो ग्राहक दूसरी चीजों पर खर्च कम करेंगे। बहुत से देशों में तो इसका असर दिखना शुरू हो गया है। ईंधन महंगा होने से हर कारोबार की इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। गाड़ियों का भाव बढ़ा है। सफर करने का किराया बढ़ गया है। फर्टिलाइजर की कमी से इसके दाम बढ़ गए हैं। इसका सीधा असर खेती की उपज पर पड़ेगा। किसानों की लागत बढ़ेगी तो जाहिर है अनाज गल्ला महंगा होगा और यह समस्या घर-घर की पूरी दुनिया की होगी।

यूनाइटेड नेशंस के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन यानी एफएओ ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में दुनिया के कई देशों में खाने-पीने की महंगाई की भयंकर लहर आने वाली है। दे कमोडिटी हैज़ शो इंक्रीस ऑल सीड्स एंड शुगर एंड रीज़ युद्ध के बाद से सबसे ज्यादा चीनी और तिलहन के दाम बढ़े हैं। क्योंकि इनका सीधा संबंध तेल के बढ़ते दामों से है। तिलहन और एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीनी का सीधा संबंध ऊर्जा बाजार से है। इसीलिए इनके दाम बढ़ रहे हैं। अगर इनके दाम बढ़ते हैं तो फिर आगे चलकर अनाज और खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ेंगी। यह सब कुछ मौजूदा हालात पर निर्भर करेगा। अगर युद्ध अभी रुक जाता है तो खाद्यान्न के दाम ज्यादा नहीं बढ़ेंगे। लेकिन अगर जंग चलती रही तो दुनिया भर में फूड सप्लाई पर बुरा असर पड़ेगा। इससे आगे चलकर दाम बढ़ेंगे। अनाज की नहीं सब कुछ महंगा होगा। दिक्कत यह है कि युद्ध रुकने के फिलहाल कोई संकेत नहीं दिख रहे। ईरान ने ट्रंप की धमकी के आगे सरेंडर करने से इंकार कर दिया है।

वहीं अमेरिका और इजराइल अब ईरान के तेल, गैस और बिजली के ठिकानों पर बम बरसाने लगे हैं। ट्रंप हर रोज नई धमकी देकर ईरान को सरेंडर के लिए बोलते हैं और ईरान इसका जवाब इजराइल और अरब देशों पर ड्रोन से हमला करके तबाही मचा कर देता है। America-Iran War को ट्रंप चुटकी बजाते समेटने के फिराक में हैं वो अब सातवें हफ्ते की तरफ बढ़ चुका है। खुद ट्रंप यह मान चुके हैं कि उन्होंने सोचा था कि America-Iran War सिर्फ तीन दिन में सिमट जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिस युद्ध को ट्रंप 3 दिन में निपटाने की भविष्यवाणी कर रहे थे। उसको शुरू हुए 37 दिन बीत चुके हैं। युद्ध और लंबा खींचा तो विश्व अर्थव्यवस्था का मंदी के ज्वालामुखी में समाना है।

अगर वह युद्ध जारी रखते हैं तो इससे इंटरनेशनल इकॉनमी गर्भ में चली जाएगी और पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में इंटरनेशनल वाइड्रेशन अमेरिका के प्रोफेसर जॉन मियर शाइमन जो चेतावनी दे रहे हैं America-Iran War इंपैक्ट अभी से दिखने लगा है। जर्मनी ने अपनी ग्रोथ फॉरकास्ट को 1.2% से घटाकर 0.6% कर दिया है। यानी जर्मनी की विकास दर आधी रह जाएगी। खाड़ी के छह देशों ने अपनी संभावित ग्रोथ रेट में करीब 25% की कटौती की है। ब्रिटेन, जापान, साउथ कोरियान और भारत के विकास दर में गिरावट आने की आशंका है। ट्रंप नेतन याू की युद्ध की पिपासा ने दुनिया की डेवलप्ड इकॉनमी की हालत बिगाड़ दी है। ऑस्ट्रेलिया में पेट्रोल पंप सूख रहे हैं। साउथ कोरिया की सरकार ने हालात से निपटने के लिए संसद से बजट बढ़ाने की मांग की है। पहले से सुस्ती के शिकार जापान का हाल और बुरा है। वहीं दक्षिण पूर्वी एशिया में फिलीपींस ने युद्ध की वजह से एनर्जी इमरजेंसी लगा दी है। श्रीलंका में ईंधन बचाने के तमाम उपायों के साथ-साथ एक दिन की एडिशनल छुट्टी घोषित कर दी गई है। इंडोनेशिया में सारे सरकारी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया गया है। यही स्टेप मलेशिया को उठाना पड़ा। वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, बांग्लादेश और थाईलैंड में ईंधन की राशनिंग की जा रही है। जानकार कह रहे हैं कि युद्ध की वजह से एक तरफ तो ग्रोथ रेट धीमी रहेगी। वहीं दूसरी ओर महंगाई बढ़ेगी जिससे स्टेज फ्लेशन की सिचुएशन पैदा होगी। इफ द क्रिटिकल मिडल ईस्टर्न एनर्जी सोर्सेस एंड सप्लाई रूट्स रिमेन फॉर एन एक्सटेंड। अगर मिडिल ईस्ट के बेहद अहम एनर्जी सोर्स और सप्लाई रूट लंबे वक्त तक कटे रहते हैं तो इसके नतीजे बेहद भयानक होंगे। इससे ना केवल दाम आसमान पर रहेंगे बल्कि दुनिया में एनर्जी की किल्लत भी होगी। इससे रोजमर्रा की जिंदगी पर बुरा असर पड़ेगा। प्रोडक्शन कम होगा और हर देश की अर्थव्यवस्था पर प्रेशर बढ़ेगा। आउटपुट घट जाएगा और जरूरी सामान की कीमतें बढ़ जाएंगी। अर्थशास्त्री इसे स्टकफ्लेशन कहते हैं और अगर एक बार स्टकफ्लेशन ने जड़े जमा ली तो यह बहुत नुकसानदेह होगा और इस पर काबू पाना बेहद मुश्किल होगा।

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