कभी सोचा है कि हमारी बॉडी बिना किसी दवाई, बिना किसी मशीन और बिना किसी बाहरी मदद के खुद को अंदर से ठीक कैसे करती है? सोचिए जरा। Benefits of Fasting: अगर आपके शरीर के अंदर एक ऐसा सिस्टम हो जो खराब हो चुकी कोशिकाओं को खुद पहचान ले, उन्हें तोड़ दे, रिसाइकल कर दे और उसी से नई मजबूत और हेल्दी कोशिकाएं बना दे, तो क्या वह किसी चमत्कार से कम होगा? लेकिन यह कोई जादू नहीं है। यह कोई साइंस फिक्शन नहीं है। यह एक बिल्कुल रियल, साइंटिफिक और बेहद पावरफुल बायोलॉजिकल प्रोसेस है। जिसे हम कहते हैं ऑनटोफेजी।

ऑनटोफेजी ( उपवास ) क्या है
ऑनटोफेजी को समझने से पहले इस शब्द को ही थोड़ा तोड़ कर समझते हैं। यह ग्रीक भाषा से आया है। इसमें ऑंटो का मतलब होता है खुद और फैगी का मतलब होता है खाना। यानी सीधा सा मतलब हुआ खुद को खाना। अब सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन असल में यह हमारी बॉडी का सबसे इंटेलिजेंट, सेफ्टी और क्लीनिंग सिस्टम है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे आपके शरीर के अंदर एक ऑटोमेटिक डीप क्लीनिंग मशीन लगी हो जो समय-समय पर पूरे सिस्टम की सफाई करती रहती है। हमारे हर सेल के अंदर दिन भर काम करते-करते बहुत सारा कचरा जमा हो जाता है।
डैमेज्ड प्रोटीनंस, टूटे हुए पार्ट्स, पुराने बेकार हो चुके स्ट्रक्चर्स अगर यह कचरा जमा होता रहे तो सेल कमजोर होने लगता है। बीमारी का रिस्क बढ़ जाता है और एजिंग तेज हो जाती है। लेकिन ऑटोफेजी इस जंग को पहचानती है। उसे तोड़ती है, रिसाइकल करती है और उसी रॉ मटेरियल से नए हेल्दी सेल पार्ट्स बना देती है। बिल्कुल जैसे कबाड़ से जुगाड़, पुरानी चीजों से नई ताकत और यह कोई छोटी-मोटी थ्योरी नहीं है। इस प्रोसेस की गहराई को समझने के लिए जापान के वैज्ञानिक योशिनोरी ओसुमी को साल 2016 में मेडिसिन का नोबेल प्राइज मिला था। सोचिए जब किसी चीज पर नोबेल प्राइज मिलता है तो इसका मतलब होता है कि उसके पीछे सालों की रिसर्च, एक्सपेरिमेंट और सॉलिड साइंस खड़ी है।
ऑटोफेजी ( उपवास ) करने से शरीर में बदलाव | Benefits of Fasting
यानी ऑटोफेजी सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं है। यह हार्ड साइंस है। अब सवाल उठता है इस नेचुरल क्लीनिंग सिस्टम को एक्टिवेट कैसे किया जाए? क्या इसके लिए कोई दवा चाहिए? कोई सप्लीमेंट, कोई महंगा ट्रीटमेंट? नहीं। इसका सबसे पावरफुल और नेचुरल ट्रिगर है फास्टिंग यानी उपवास। जब हम लगातार खाते रहते हैं तो बॉडी को बाहर से एनर्जी मिलती रहती है। उसे अंदर सफाई करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। लेकिन जैसे ही हम खाना बंद करते हैं, बॉडी को एक सिग्नल मिलता है कि अब बाहर से फ्यूल नहीं आ रहा। तब शरीर अंदर की तरफ देखता है और वहां जमा हुए जंक, खराब सेल्स और एक्स्ट्रा फैट को फ्यूल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर देता है।
Benefits of Fasting: यहीं से ऑटोफेजी एक्टिवेट होती है। इस दौरान शरीर के अंदर एक बहुत बड़ा मेटाबॉलिक शिफ्ट होता है। आमतौर पर हमारा शरीर एनर्जी के लिए ग्लूकोस यानी शुगर का इस्तेमाल करता है। जो हमें खाने से मिलती है। लेकिन जब फास्टिंग में यह ग्लूकोस खत्म हो जाता है, तब शरीर फैट को जलाना शुरू करता है। इसी प्रोसेस में बनते हैं कीटोंस और यह कीटोंस हमारे ब्रेन के लिए सुपर क्लीन सुपर एफिशिएंट फ्यूल की तरह काम करते हैं। यही वजह है कि बहुत से लोग फास्टिंग के दौरान अचानक ज्यादा फोकस, शार्प क्लेरिटी और मेंटल एनर्जी महसूस करते हैं।
अब रिसर्च में अक्सर लंबे फास्ट को अलग-अलग स्टेज में समझाया जाता है। तो चलिए एक टिपिकल मल्टीडे फास्ट की जर्नी को धीरे-धीरे समझते हैं कि शरीर के अंदर आखिर चल क्या रहा होता है। पहले दिन शरीर अपने लिवर और मसल्स में स्टोर किए गए ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है। ग्लाइकोजन असल में शुगर का स्टोरेज फॉर्म होता है। लेकिन यहां एक इंटरेस्टिंग बात है ग्लाइकोजन पानी के साथ स्टोर होता है। तो जब यह ग्लाइकोजन जलता है तो उसके साथ पानी भी बाहर निकलता है। इसलिए शुरुआत में जो वजन तेजी से कम होता दिखता है वह ज्यादातर फैट नहीं बल्कि वाटर वेट होता है। यही वजह है कि लोग शुरुआत में बहुत एक्साइटेड हो जाते हैं। लेकिन असली फैट लॉस थोड़ा बाद में शुरू होता है। लेकिन पहले दिन का असली गेम चेंजर होता है।
बॉडी पार्ट में क्या खास होता है
इंसुलिन एक ऐसा हॉर्मोन है जो शरीर को फैट स्टोर करने का सिग्नल देता है। जैसे ही फास्टिंग शुरू होती है इंसुलिन का लेवल तेजी से गिरने लगता है और जैसे ही इंसुलिन नीचे जाता है, शरीर का फैट बर्निंग स्विच ऑन हो जाता है। यहीं से बॉडी असली बदलाव की तैयारी में प्रवेश करती है और इसी मोड़ पर शरीर एक नई अवस्था में प्रवेश करने लगता है। जहां सिर्फ वजन कम होना नहीं बल्कि सेल्यूलर लेवल पर रिपेयर शुरू होता है। लेकिन असली पावरफुल बदलाव दूसरे और तीसरे दिन पर गैस से एक्टिवेट होते हैं। जैसे-जैसे फास्टिंग आगे बढ़ती है और दूसरा दिन शुरू होता है।
शरीर अब सिर्फ एनर्जी बचाने की कोशिश नहीं कर रहा होता बल्कि वह खुद को रिप्रोग्राम करना शुरू कर देता है। इस स्टेज पर बॉडी धीरे-धीरे डीप कीटोसिस में चली जाती है। अब ग्लूकोज लगभग खत्म हो चुका होता है और एनर्जी का मुख्य सोर्स बन जाते हैं फैट से बने कीटोंस। यही वह मोमेंट है जहां ऑंटोफेजी का इंजन पूरी स्पीड पकड़ लेता है। अब शरीर अंदर जमा पुराने कमजोर और डैमेज्ड सेल्स को तोड़-तोड़ कर साफ करने लगता है। यह सिर्फ सफाई नहीं है। यह एक तरह का इंटरनल अपग्रेड है। जैसे कोई पुराना सॉफ्टवेयर हटाकर नया फास्ट और ज्यादा सिक्योर वर्जन इंस्टॉल किया जाए।
इसी दौरान ब्रेन के अंदर एक बेहद खास प्रोटीन का लेवल बढ़ता है जिसे कहते हैं बीडीएफ ब्रेन डिराइव्ड न्यूरोट्रोफिक फैक्टर। यह प्रोटीन नए न्यूरॉन्स की ग्रोथ को सपोर्ट करता है। ब्रेन कनेक्शन को मजबूत करता है और लर्निंग, फोकस और मेमोरी को तेज करता है। यही वजह है कि बहुत से लोग इस फेज में अचानक जबरदस्त मेंटल क्लेरिटी, शांति और डीप फोकस महसूस करते हैं। सोचिए भूखे रहने पर दिमाग कमजोर होने के बजाय और ज्यादा शार्प हो जाता है।
लोगो का उपवास को लेकर ग़लतफ़हमी
लेकिन इसी पॉइंट पर लोगों के मन में एक बड़ा डर पैदा होता है। मसल लॉस का डर। लोग सोचते हैं कि अगर शरीर को बाहर से खाना नहीं मिलेगा तो क्या वह अपनी ही मसल्स को जलाना शुरू नहीं कर देगा। यह डर बिल्कुल नेचुरल है। लेकिन यहां शरीर की इंटेलिजेंस समझना जरूरी है। रिसर्च बताती है कि फास्टिंग के दौरान शरीर में ग्रोथ हॉर्मोन का लेवल तेजी से बढ़ता है। कई बार तो नॉर्मल से कई गुना ज्यादा। यह हार्मोन मसल टिश्यू को टूटने से बचाता है और फैट को एनर्जी के रूप में इस्तेमाल करने को प्राथमिकता देता है।
यानी बॉडी की पहली चॉइस होती है फैट और सेलुलर शंक को जलाना मसल्स को नहीं। तो अगर हम इस पूरे फेस को समराइज करें तो एक लंबे फास्ट के दौरान तीन बड़े बदलाव होते हैं। पहला इंसुलिन का लेवल बहुत नीचे चला जाता है। जिससे फैट स्टोरेज बंद हो जाती है। दूसरा ऑंटोफेजी तेजी से एक्टिव हो जाती है और सेलुलर क्लीनिंग शुरू हो जाती है। और तीसरा ग्रोथ हॉर्मोन मसल्स को प्रोटेक्ट करता है ताकि शरीर की ताकत बनी रहे। अब जैसे-जैसे चौथा और पांचवा दिन आता है, शरीर एक अलग ही मोड़ में प्रवेश कर जाता है।
अब वह एक सुपर एफिशिएंट फैट बर्निंग मशीन बन चुका होता है। इस स्टेज पर अक्सर भूख लगभग गायब हो जाती है क्योंकि शरीर अब अपने ही फैट स्टोर्स से लगातार एनर्जी निकालने में एक्सपर्ट बन चुका होता है। यहां तक कि कुछ रिसर्च यह भी बताती है कि इसी फेज में कुछ ऐसे जीन एक्टिवेट होते हैं जो लंबी उम्र, सेल रिपेयर और डिजीज रेजिस्टेंस से जुड़े होते हैं। यानी शरीर सिर्फ सर्वाइव नहीं कर रहा। वह खुद को भविष्य के लिए और ज्यादा मजबूत बना रहा है। लेकिन यहीं पर कहानी खत्म नहीं होती। फास्टिंग से बॉडी की डीप क्लीनिंग तो हो जाती हो लेकिन असली जादू तो उसके बाद शुरू होता है।
उपवास तोड़ने का सही तरीका
बहुत लोग सिर्फ फास्ट पर फोकस करते हैं और एक सबसे जरूरी स्टेज को नजरअंदाज कर देते हैं और वह स्टेज है रिफीडिंग यानी फास्ट को सही तरीके से तोड़ना। इसे ऐसे समझिए मान लीजिए आपने एक पुरानी कमजोर बिल्डिंग को गिरा दिया। मलबा साफ कर दिया। अब अगर आप वहीं छोड़ दें तो फायदा क्या? असली काम तो नई मजबूत नीव डालने और उस पर नई इमारत खड़ी करने का होता है। फास्टिंग डेमोलिशन है और रिफीडिंग रिकंस्ट्रक्शन। फास्टिंग के दौरान शरीर पुरानी, कमजोर और खराब हो चुकी इम्यून सेल्स को खत्म करता है। लेकिन जब आप दोबारा न्यूट्रिएंट से भरपूर खाना खाते हैं, तब शरीर के अंदर मौजूद सोए हुए स्टेम सेल्स एक्टिवेट हो जाते हैं। यही स्टेम सेल्स एक नया ज्यादा मजबूत और ज्यादा स्मार्ट इम्यून सिस्टम तैयार करते हैं। यानी असली रिबिल्डिंग फास्ट के बाद होती है। इसीलिए फास्ट तोड़ने का तरीका बेहद क्रिटिकल हो जाता है। शरीर को अचानक भारी खाना, चीनी या प्रोसेस्ड फूड देकर शौक नहीं देना चाहिए। शुरुआत हमेशा हल्के, आसानी से पचने वाले और न्यूट्रिएंट डेंस फूड से करनी चाहिए। जैसे बोन रॉथ, उबले हुए अंडे, अवोकाडो या सिंपल सब्जियां। यह शरीर को धीरे-धीरे सिस्टम में वापस लाने का सही तरीका है।
किन लोगो को उपवास नहीं करना चाहिए
कौन लोग बिना मेडिकल सुपरविजन के बीना फास्टिंग नहीं करनी चाहिए और माइंड बॉडी कनेक्शन इसमें कैसे रोल निभाता है? अब एक बहुत जरूरीऔर ईमानदार बात समझना जरूरी है। फास्टिंग और ऑंटोफेजी कोई मैजिक बिल नहीं है। यह कोई ऐसा चमत्कार नहीं है जो हर बीमारी को अपने आप ठीक कर दे। इंटरनेट पर बहुत से लोग गलत दावे करते हैं। जैसे कि फास्टिंग कैंसर को ठीक कर सकती है या हर तरह की बीमारी खत्म कर सकती है। यह सोच खतरनाक है। सच्चाई यह है कि किसी भी तरह का लंबा फास्ट शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना।
इसमें कोई समझौता नहीं होना चाहिए क्योंकि हर इंसान की बॉडी अलग होती है। उसकी मेडिकल हिस्ट्री अलग होती है और उसकी लिमिट्स भी अलग होती है। कुछ लोगों के लिए फास्टिंग बिल्कुल सुरक्षित नहीं होती। जैसे गर्भवती महिलाएं, टाइप डायबिटीज के मरीज, बहुत ज्यादा अंडरवेट लोग या जिनकी ईटिंग डिसऑर्नर की हिस्ट्री रही हो। इन मामलों में बिना मेडिकल सुपरविजन फास्टिंग करना शरीर को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए ज्ञान के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। यहां एक और बेहद दिलचस्प एंगल है माइंड और बॉडी का कनेक्शन। Benefits of Fasting: कुछ स्टडीज बताती हैं कि जब फास्टिंग के दौरान मन शांत, फोकस्ड और स्टेबल रहता है तो शरीर फैट बर्न करने और सेल रिपेयर में ज्यादा एफिशिएंट हो जाता है।
लेकिन अगर इंसान लगातार स्ट्रेस, डर या एंग्जायटी में रहे तो शरीर में कॉर्टिसोल बढ़ सकता है। जिससे मसल लॉस और थकावट बढ़ने का रिस्क होता है। यानी आपकी सोच, आपकी भावनाएं और आपका मानसिक संतुलन सीधे आपके फिजिकल रिजल्ट्स को प्रभावित करते हैं। यह बात हमें यह सिखाती है कि हेल्थ सिर्फ डाइट या फास्टिंग का खेल नहीं है बल्कि माइंडसेट का भी खेल है। तो ऑटोफेजी का असली मतलब सिर्फ भूखा रहना नहीं है। Benefits of Fasting: इसका मतलब है अपने शरीर के इंटेलिजेंट रिपेयर सिस्टम को समझना। उसे सही टाइमिंग, सही डिसिप्लिन और सही अवेयरनेस के साथ सपोर्ट करना। कभी-कभी कम करना ही असली अपग्रेड बन जाता है। कम खाना, कम ओवरलोड, कम डिस्ट्रैक्शन ताकि शरीर और दिमाग दोनों खुद को रिसेट कर सके।
Desclaimer:
लेकिन यहां एक बहुत जरूरी सच्चाई समझना भी जरूरी है। ऑन एटोफेजी कोई जादुई इलाज नहीं है (Benefits of Fasting)। इंटरनेट पर फैली कई बातें अधूरी या गलत है। कुछ लोग दावा करते हैं कि फास्टिंग कैंसर जैसी बीमारियों को ठीक कर सकती है। यह बेहद खतरनाक सोच है। किसी भी तरह का लंबा फास्ट शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बिल्कुल अनिवार्य है। और यह भी समझना जरूरी है कि फास्टिंग हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं होती।
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